मुस्कुराहट – एक जज़्बा

सतीश गणवीर


तुम्हारी मुस्कुराहटो ने मुझे फिर एक बार, उस मुकाम पर ला खड़ा किया है,

जहाँ से हर चीज बड़ी प्यारी और सुहानी लगने लगी है |

 

दिल से होठों पर आई हुई तुम्हारी मुस्कराहट, कई बार, कई चीजे एक साथ बयाँ कर जाती है,

लेकिन फिर ख्याल आता है कि, बीच में पड़ाव डाले हुए ये फासले और ये दूरियाँ,

इनका क्या? क्या ये सही में तय हो पाएंगे?

इन हालातों में लाख चाहने पर भी, इस अफ़साने को अंजाम नहीं दिया जा सकेगा,

यही सच्चाई है |

 

बुलंदी कि रहगुज़र अवमानना कि गलियारों से ही होकर गुज़रती है,

अतः तुम्हें अपना मुकाम हासिल करने के लिए, अपमान का यह ज़हर मुस्कुराते हुए पीना ही होगा |

 

कर्मों की गति ने, हम सभी को हमारी काबिलियत के मुताबिक ही हैसियत बक्षी है,

इसलिए आज मेरे पास तुम्हें अर्पण करने के लिए इन शब्दों के सिवाए कुछ भी नहीं |

 

मैं नहीं जानता, भावनाओं की उम्र हुआ करती है या नहीं,

क्योंकि उन्हें मापने का मेरे पास कोई यंत्र नहीं,

किन्तु यह तय है कि जज़्बातों का भी वजूद हुआ करता है,

इन्हीं से ही कई बार कायनातें बदली है, इतिहास गवाह है |

 

इन अल्फाज़ों को बेमकसद न समझना,

जिन्दगानियाँ यहीं ख़त्म नहीं हुआ करती,

हिसाबकिताब चुकाने के लिए फिर आना ही पड़ता है,

शायद यही कुदरत का कानून है |

 

कसौटी तो इस बात कि है कि,

दुःख कि घड़ी में और जीवन के अंतिम क्षणों में,

सदानंद कि तरह, हम सभी के होठों पर मुस्कराहट हो,

हम सभी के होठों पर मुस्कराहट हो |

 

बस यही इल्तिजा है और यही इल्तिजा रहेगी,

बस यही इल्तिजा है और यही इल्तिजा रहेगी|

 

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