अस्तित्व और व्यक्तित्व

आदित्य नारायण अग्निहोत्री

 

अस्तित्व
शतशत वंदन अस्तित्व तुम्हें, जनते हो वह व्यक्तित्व जिन्हें,
पाकर धरती हो गयी अमर, छूकर मानवता हुई प्रखर,
आलिंगन में जिनको लेकर, अक्षय आशीष जिन्हें देकर,
ममता का स्वर हो गया मुखर |
सदियों की धूल न छिपा सकी, जिनकी किरणों का पुंज उन्हें,
शतशत वंदन अस्तित्व तुम्हें |

व्यक्तित्व
मैं चकित हुआ सा रहता हूँ, प्रतिदिन यह स्वयं से कहता हूँ,
हूँ कौन कहाँ से आया हूँ, क्या मैं बस नश्वर काया हूँ?
दर्पण में देख स्वयं को मैं, बस यही सोचता रहता हूँ |
है कौन झांकता अन्दर से? नयनों के विरल झरोखे से,
है कौन जीव? हो गया कैद मेरे शरीर में धोखे से|
यदि मैं वह जीव स्वयं में हूँ,
तब मैं, फिर मैं, किस मैं को कहूं?
इस ‘मैं ‘ की भूलभुलैया में, मैं भ्रमित घूमता रहता हूँ |
मैं चकित हुआ सा रहता हूँ, मैं चकित हुआ सा रहता हूँ |

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