मित्रता

निखिल मिश्रा

 

बात है निराली”, पहले मैं ऐसा कहता,
सुखों में भी मैं अत्यंत दुखी रहता |
लोग कहते मेरा स्वभाव विचित्र था,
माँ ने बताया कारण, ना मेरा कोई मित्र था
माँ ने कहा, ” कुछ मित्र बनाओ,
उज्ज्वल अपना चरित्र बनाओ,
सबके मन में अपना अच्छा,
अमरअमित सा चित्र बनाओ |

ना जानूं मेरे मित्र को मुझसे आशा क्या होती है,
ना मैं जानूं मित्रता की परिभाषा क्या होती है |
माँ का उत्तर मन में मेरे ऐसे आकर चिपक गया,
कि, मित्रता की पराकाष्ठा को बस उस दिन ही मैं समझ गया |

मित्र वही, जो साथ रहे,
गलत ही सदा सिद्ध करे,
उन बातों को, जो कबीर ने कहे,
कि, दुख में मित्र ना मित्र रहे |

बदल गया हूँ मैं”, अब मैं यही कहता हूँ,
दुखों में भी मैं अत्यंत सुखी रहता हूँ |
लोग कहते हैं मेरा स्वभाव अब और विचित्र हो गया है,
मैं बतलाता कारण, “अब सारा संसार मेरा मित्र हो गया” |

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